JF-17 की हकीकत: पाकिस्तान की फाइटर जेट ‘कामयाबी’ आसमान में नहीं, सोशल मीडिया पर

JF-17 फाइटर जेट को लेकर पाकिस्तान के बढ़ते दावे पुख्ता सौदों से ज़्यादा मीडिया नैरेटिव पर आधारित हैं।

JF-17 की हकीकत: पाकिस्तान की फाइटर जेट ‘कामयाबी’ आसमान में नहीं, सोशल मीडिया पर

पाकिस्तान इन दिनों हवाई युद्ध से ज़्यादा कथानक (नैरेटिव) की लड़ाई जीतता नज़र आ रहा है। हाल के हफ्तों में इस्लामाबाद यह दावा करता रहा है कि उसका तथाकथित स्वदेशी लड़ाकू विमान JF-17 Thunder अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेज़ी से लोकप्रिय हो रहा है। लेकिन गहराई से देखने पर यह कहानी बेहद सतही प्रतीत होती है।

इस नैरेटिव को हवा देने में Reuters और उसके पाकिस्तान-आधारित पत्रकार Saad Sayeed की रिपोर्टिंग अहम भूमिका निभाती दिखती है। 2026 की शुरुआत से Reuters की कई रिपोर्टों में दावा किया गया कि बांग्लादेश, सूडान, इंडोनेशिया और यहां तक कि सऊदी अरब भी JF-17 खरीदने पर विचार कर रहे हैं।

हालांकि इन रिपोर्टों में किसी भी पुख्ता समझौते, आधिकारिक घोषणा, डिलीवरी टाइमलाइन या सरकारी पुष्टि का अभाव है। अधिकांश दावे अज्ञात सूत्रों और संभावनाओं पर आधारित हैं।

सबसे चौंकाने वाला दावा सऊदी अरब से जुड़ा था — कि वह पाकिस्तान को दिए गए 2 अरब डॉलर के ऋण को JF-17 सौदे में बदल सकता है। यह दावा इसलिए भी अविश्वसनीय लगा क्योंकि सऊदी वायुसेना पहले से ही F-15 और यूरोफाइटर टाइफून जैसे उन्नत लड़ाकू विमानों से लैस है और F-35 खरीदने की प्रक्रिया में है। यह कहानी तब ढह गई जब पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा कि उसे ऐसी किसी बातचीत की जानकारी नहीं है।

इसी तरह, दिसंबर 2025 में Reuters ने लीबिया की नेशनल आर्मी के साथ 4 अरब डॉलर के JF-17 सौदे का दावा किया, जबकि लीबिया पर संयुक्त राष्ट्र का हथियार प्रतिबंध लागू है।

दावे बनाम ज़मीनी सच्चाई

JF-17 को लेकर बढ़ती चर्चा को कई विश्लेषक Asim Munir के नेतृत्व वाली व्यवस्था द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के बाद कथित “जीत” को मज़बूत करने की कोशिश के रूप में देखते हैं।

हकीकत यह है कि ऑपरेशन के शुरुआती चरण में मुख्य रूप से चीनी J-10C विमान सक्रिय थे, न कि JF-17। इसके बावजूद, JF-17 को अब ‘युद्ध-सिद्ध’ विमान के रूप में पेश किया जा रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान के भीतर ही कई रक्षा विश्लेषक इन दावों पर सवाल उठा रहे हैं।

JF-17 के वास्तविक निर्यात ग्राहक सिर्फ म्यांमार और नाइजीरिया हैं — और दोनों देशों को विमान के संचालन में गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा है। म्यांमार में खराब एवियोनिक्स, संरचनात्मक खामियों और स्पेयर पार्ट्स की कमी के कारण कई विमान ज़मीन पर खड़े रहे।

औद्योगिक सीमाएं

प्रदर्शन से इतर, पाकिस्तान की औद्योगिक क्षमता भी एक बड़ी बाधा है। Pakistan Aeronautical Complex (कामरा) सालाना केवल 20–25 विमान ही बना सकता है, और वह भी चीनी एवियोनिक्स और रूसी इंजनों पर भारी निर्भरता के साथ।

विशेषज्ञों का कहना है कि रक्षा निर्यात सिर्फ प्रचार से नहीं, बल्कि मज़बूत उत्पादन क्षमता, दीर्घकालिक मेंटेनेंस और भरोसेमंद सपोर्ट सिस्टम से टिकता है — जिनमें पाकिस्तान अभी पीछे है।

अंततः, आलोचकों का मानना है कि काल्पनिक ऑर्डर बुक और आकर्षक सुर्खियां भले ही कुछ समय के लिए प्रभाव डालें, लेकिन वे किसी देश को वास्तविक रक्षा विनिर्माण शक्ति नहीं बना सकतीं।