एनईईटी विरोध प्रदर्शनों पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश: राज्यों को छात्रों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेने का निर्देश, गंभीर या हिंसक आपराधिक मामलों में शामिल व्यक्तियों को छूट।
एनईईटी विरोध प्रदर्शनों पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश: राज्यों को छात्रों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेने का निर्देश, गंभीर या हिंसक आपराधिक मामलों में शामिल व्यक्तियों को छूट।
एनईईटी विरोध प्रदर्शन और सुप्रीम कोर्ट का आदेश: एक विस्तृत विश्लेषण
परिचय और पृष्ठभूमि
नीट-यूजी (NEET-UG) परीक्षा में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक और व्यवस्थागत विफलताओं के खिलाफ देशभर में भड़के छात्र आक्रोश के संदर्भ में भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) का ऐतिहासिक हस्तक्षेप युवा सक्रियता, संवैधानिक अधिकारों, राज्य प्रशासन और पुलिस जवाबदेही के बीच के समकालीन संबंधों को परिभाषित करने वाला एक महत्वपूर्ण मोड़ है।
इस विवाद की शुरुआत नीट परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और भविष्य को लेकर उपजे भारी तनाव के बाद हुई। शुरुआती स्तर पर छात्रों की यह निराशा और प्रशासनिक सुधार की मांगें जल्द ही एक व्यापक राष्ट्रव्यापी आंदोलन में बदल गईं। विभिन्न क्षेत्रों में छात्र संगठनों और राजनीतिक समूहों द्वारा इस आंदोलन को गति दी गई, जिसके तहत 20 जुलाई को संसद की ओर एक बड़ा मार्च भी निकाला गया।
जब दिल्ली, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम और गुजरात सहित कई राज्यों की सड़कों पर हजारों की संख्या में युवा आकांक्षी, छात्र नेता और उनके समर्थक उतरे, तो स्थिति तनावपूर्ण हो गई। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच टकराव की स्थिति बन गई। इसके जवाब में राज्य तंत्र ने कड़े कदम उठाए, जिसके परिणामस्वरूप व्यापक स्तर पर लोगों को हिरासत में लिया गया, कई प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गईं और पुलिस कार्रवाई पर गंभीर आरोप लगे। लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोले छोड़े जाने और रबर बुलेट या पैलेट गन के कथित इस्तेमाल जैसी घटनाओं ने हालात को और गंभीर बना दिया।
इन घटनाक्रमों के बाद, संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिकाएं और रिट याचिकाएं दायर की गईं। इनमें मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 14, 19 और 21) के प्रवर्तन, राज्य प्रायोजित ज्यादतियों से सुरक्षा और उन युवा छात्रों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को तुरंत रद्द करने की मांग की गई, जिनके शैक्षणिक और व्यावसायिक भविष्य पर तलवार लटकी हुई थी।
सर्वोच्च न्यायालय की कार्यवाही का घटनाक्रम
इस मामले में न्यायिक हस्तक्षेप उन महत्वपूर्ण सुनवाइयों के माध्यम से आगे बढ़ा, जिन्होंने छात्र प्रदर्शनकारियों को राहत मिलने का दायरा तय किया:
1. प्रारंभिक निर्देश (28 जुलाई 2026)
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमालय बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इन याचिकाओं पर संज्ञान लिया। न्यायालय ने माना कि हजारों छात्र इस नागरिक अशांति की चपेट में आ गए हैं, और इसके साथ ही तत्काल निर्देश जारी किए गए:
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नाबालिगों की रिहाई: राज्यों को यह निर्देश दिया गया कि वे विरोध प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को तुरंत रिहा करें, बशर्ते उनका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड न हो।
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दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा: अदालत ने आदेश दिया कि छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ फिलहाल कोई भी दंडात्मक कार्रवाई (coercive action) न की जाए, हालांकि विरोध प्रदर्शनों के व्यापक संदर्भ की जांच कानून के अनुसार जारी रखी जा सकती है।
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साक्ष्यों का संरक्षण: हिंसा के दोनों पक्षों के आरोपों को ध्यान में रखते हुए, अदालत ने सभी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों—जैसे सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग, बॉडी-कैमरा क्लिप और वायरलेस संचार लॉग—को सुरक्षित रखने का आदेश दिया ताकि भविष्य में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जा सके।
2. महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण (3 अगस्त 2026)
जब राज्य मशीनरी और केंद्रीय निर्देशों के बीच कार्यान्वयन को लेकर कुछ अस्पष्टता सामने आई, तो मामले को वापस पीठ के समक्ष लाया गया। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर तथा अभिषेक सिंघवी जैसे वकीलों ने छात्र प्रदर्शनकारियों के कानूनी मुकदमों को समाप्त करने की व्यावहारिकताओं पर बहस की।
केंद्र सरकार ने औपचारिक रूप से यह प्रस्तुत किया कि वह नीट प्रदर्शनों में भाग लेने वाले छात्रों के खिलाफ आपराधिक मामलों को आगे न बढ़ाने की अपनी प्रतिबद्धता के प्रति गंभीर है। हालांकि, पिछले आदेश में प्रयुक्त "आपराधिक पृष्ठभूमि" (criminal antecedents) वाक्यांश को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा हो गई थी, क्योंकि राज्य यह तय नहीं कर पा रहे थे कि छोटे-मोटे उल्लंघनों, ट्रैफिक चालान या राजनीतिक रूप से प्रेरित छोटे-मोटे विवादों वाले व्यक्तियों को राहत के दायरे से बाहर रखा जाए या नहीं।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के मुख्य कानूनी आयाम
सर्वोच्च न्यायालय के बाद के बयानों और आदेशों ने नागरिक स्वतंत्रता, सार्वजनिक सुरक्षा और प्रशासनिक विवेक के बीच संतुलन बनाने वाले स्पष्ट मानक स्थापित किए।
"आपराधिक पृष्ठभूमि" की पुनः व्याख्या
राज्य प्रशासनों को छात्र कार्यकर्ताओं के खिलाफ मामलों को जीवित रखने के लिए व्यापक परिभाषाओं का उपयोग करने से रोकने के लिए, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से यह स्पष्ट किया कि "आपराधिक पृष्ठभूमि" शब्द का सख्त अर्थ केवल गंभीर और जघन्य अपराधों (जैसे हत्या, डकैती या विशेष दंड कानूनों के तहत गंभीर चोट) में संलिप्तता से है।
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छोटे-मोटे उल्लंघन, मामूली अपराध, पिछले यातायात उल्लंघन, या राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामूली झड़पें इस दायरे में नहीं आएंगी।
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परिणामस्वरूप, अधिकारियों द्वारा पहचाने गए वे 2,700 से अधिक व्यक्ति, जिन पर गंभीर, हिंसक या आदतन आपराधिक मामले दर्ज हैं, वे सक्रिय जांच और अभियोजन के दायरे में बने रहेंगे, जबकि सामान्य छात्र प्रदर्शनकारियों को सुरक्षा मिलेगी।
राज्य सरकारों को एफआईआर वापस लेने का अधिकार
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से यह फैसला सुनाया कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCT) दिल्ली और सभी राज्य सरकारें कानून के अनुसार छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को बंद करने या वापस लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
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प्रत्येक व्यक्तिगत छात्र को मामले बंद करवाने या रद्द कराने की याचिकाओं के लिए निचली अदालतों या सरकारी वकीलों के चक्कर काटने की लंबी और कठिन प्रक्रिया से गुजरने के लिए मजबूर करने के बजाय, राज्य तंत्रों को प्रशासनिक रूप से सामूहिक या श्रेणी-आधारित मामलों को वापस लेने की न्यायिक अनुमति दे दी गई।
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गुजरात सहित कई राज्यों ने तुरंत नीट आंदोलन से जुड़ी गैर-गंभीर एफआईआर की समीक्षा करने और उन्हें वापस लेने की प्रशासनिक प्रक्रिया शुरू कर दी।
प्रदर्शन और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन
सर्वोच्च न्यायालय ने संवैधानिक सिद्धांतों को दोहराया:
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शांतिपूर्ण प्रदर्शन की पवित्रता: पीठ ने रेखांकित किया कि शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने और असहमति व्यक्त करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत एक लोकतांत्रिक गणराज्य की आधारशिला है।
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अपात्र और अत्यधिक बल प्रयोग की अस्वीकृति: अदालत ने दृढ़ता से यह observé किया कि केवल इसलिए पुलिस ज्यादती, अंधाधुंध लाठीचार्ज, या घातक/अर्ध-घातक भीड़ नियंत्रण उपकरणों के इस्तेमाल को उचित नहीं ठहराया जा सकता कि आंदोलन तीव्र या विघटनकारी था।
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दोनों पक्षों की हिंसा का समाधान: जहां अदालत ने पुलिस की अत्यधिक बर्बरता (जैसे पैलेट गन के इस्तेमाल से स्थायी विकलांगता और महिला प्रदर्शनकारियों पर हमले) का विवरण देने वाली याचिकाओं पर संज्ञान लिया, वहीं उसने सुरक्षा बलों के उन काउंटर-आरोपों पर भी ध्यान दिया जिनमें कहा गया कि भीड़ में शामिल उपद्रवियों द्वारा 200 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए। अदालत ने अनिवार्य किया कि एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच इन दोनों पहलुओं की जांच करे—यह सुनिश्चित करते हुए कि भीड़ में शामिल असामाजिक तत्वों को न्याय के कटघरे में लाया जाए और राज्य की शक्ति का दुरुपयोग करने वाले पुलिस अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जाए।
व्यापक प्रभाव और प्रशासनिक असर
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश भारत के कानूनी, शैक्षणिक और राजनीतिक परिदृश्य पर दूरगामी प्रभाव डालते हैं:
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छात्रों के भविष्य की सुरक्षा: हजारों चिकित्सा आकांक्षियों और विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए, आपराधिक रिकॉर्ड की तलवार उच्च शिक्षा के अवसरों, पासपोर्ट जारी होने और भविष्य की रोजगार स्वीकृतियों को पटरी से उतारने का डर पैदा कर रही थी। गैर-हिंसक प्रदर्शनों में शामिल छात्रों को दीर्घकालिक कानूनी कलंक से बचाकर, अदालत ने उनके पेशेवर रास्ते को सुरक्षित किया।
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भीड़ नियंत्रण का मानकीकरण: चल रही इस कानूनी कार्यवाही ने युवा-नेतृत्व वाले आंदोलनों के दौरान कानून प्रवर्तन के लिए मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) पर एक राष्ट्रीय बातचीत को अनिवार्य बना दिया है। सादे कपड़ों में कर्मियों की अनधिकृत तैनाती और पैलेट गन के अनियंत्रित उपयोग पर चर्चा से बाध्यकारी राष्ट्रीय दिशानिर्देश मिलने की उम्मीद है।
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कार्यपालिका-न्यायपालिका तालमेल: छात्र प्रदर्शनकारियों को दंडित न करने की केंद्रीय सरकार की व्यक्त मंशा और सर्वोच्च न्यायालय के संरचनात्मक फैसलों के बीच दुर्लभ तालमेल ने शैक्षिक मामलों में बड़े पैमाने पर नागरिक असंतोष से निपटने के लिए एक व्यावहारिक समाधान को तेजी से आगे बढ़ाया, जो भविष्य के लिए एक मिसाल कायम करता है।
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