तमिलनाडु में कावेरी जल विवाद को लेकर किसानों का आंदोलन तेज: सिंचाई संकट ने बढ़ाई चिंता
तमिलनाडु में कावेरी जल विवाद को लेकर किसानों का आंदोलन तेज: सिंचाई संकट ने बढ़ाई चिंता
तमिलनाडु में कावेरी जल विवाद को लेकर किसानों का आंदोलन तेज: सिंचाई संकट ने बढ़ाई चिंता
तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच लंबे समय से चल रहा कावेरी जल विवाद एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। तमिलनाडु के किसानों ने सिंचाई के लिए कावेरी नदी से पर्याप्त पानी छोड़े जाने की मांग को लेकर अपने आंदोलन को तेज कर दिया है। किसानों का कहना है कि समय पर पानी नहीं मिलने से धान की फसल, विशेषकर कुरुवई (Kuruvai) सीजन की खेती, गंभीर संकट का सामना कर रही है।
अपने आंदोलन को प्रभावशाली बनाने के लिए किसानों ने कई प्रतीकात्मक प्रदर्शन किए। इनमें सबसे चर्चित प्रदर्शन वह रहा, जिसमें किसानों ने तिरुचिरापल्ली में कावेरी नदी के किनारे स्वयं को गर्दन तक रेत में दबाकर विरोध दर्ज कराया। यह प्रदर्शन सूखती नदी और किसानों की बढ़ती परेशानियों का प्रतीक था। किसान नेता पी. अय्याकन्नू सहित कई किसान संगठनों ने सरकार से तत्काल कावेरी का पानी छोड़ने की मांग की।
कावेरी जल विवाद का इतिहास
कावेरी नदी का उद्गम कर्नाटक के पश्चिमी घाट से होता है। यह नदी कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी से होकर बंगाल की खाड़ी में मिलती है। कई दशकों से कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच इस नदी के जल बंटवारे को लेकर विवाद चलता आ रहा है।
इस विवाद के समाधान के लिए समय-समय पर कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण, सर्वोच्च न्यायालय, कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) द्वारा विभिन्न निर्णय दिए गए हैं। इसके बावजूद कम वर्षा वाले वर्षों में जल बंटवारे को लेकर विवाद फिर उभर आता है।
किसान क्यों कर रहे हैं आंदोलन?
तमिलनाडु के तंजावुर, तिरुवरूर, नागपट्टिनम और तिरुचिरापल्ली जैसे कावेरी डेल्टा क्षेत्र पूरी तरह सिंचाई के लिए कावेरी नदी पर निर्भर हैं।
किसानों का कहना है कि यदि समय पर पानी नहीं मिला तो—
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धान की रोपाई प्रभावित होगी।
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पौधों की वृद्धि रुक जाएगी।
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हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि सूख जाएगी।
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कृषि मजदूरों का रोजगार प्रभावित होगा।
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किसानों की आय में भारी गिरावट आएगी।
किसानों का मानना है कि यह केवल फसल का नहीं बल्कि लाखों परिवारों की आजीविका का प्रश्न है।
प्रतीकात्मक रेत-समाधि प्रदर्शन
किसानों ने अपनी मांगों की ओर सरकार और देश का ध्यान आकर्षित करने के लिए अनोखा विरोध प्रदर्शन किया।
तिरुचिरापल्ली में कई किसान कावेरी नदी के किनारे गर्दन तक रेत में दब गए। उनका कहना था कि जिस प्रकार वे रेत में दबे हैं, उसी प्रकार उनकी खेती और भविष्य भी पानी की कमी के कारण संकट में दबता जा रहा है।
इस प्रदर्शन की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया तथा समाचार माध्यमों में व्यापक रूप से प्रसारित हुए, जिससे यह आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।
तमिलनाडु सरकार की कानूनी पहल
किसानों के आंदोलन के साथ-साथ तमिलनाडु सरकार ने भी सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।
राज्य सरकार का आरोप है कि कर्नाटक ने कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा निर्धारित मात्रा में पानी नहीं छोड़ा है।
तमिलनाडु ने न्यायालय से अनुरोध किया है कि कर्नाटक को निर्धारित जल छोड़ने के निर्देश दिए जाएँ ताकि किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिल सके।
कर्नाटक का पक्ष
दूसरी ओर कर्नाटक सरकार और वहां के किसान संगठनों का कहना है कि राज्य में भी वर्षा सामान्य से कम हुई है।
उनका तर्क है कि राज्य के जलाशयों में जल स्तर कम है और सबसे पहले पीने के पानी तथा स्थानीय सिंचाई की आवश्यकताओं को पूरा करना जरूरी है।
इसी कारण कर्नाटक में भी कई किसान संगठनों ने अतिरिक्त पानी छोड़े जाने का विरोध किया है।
कृषि पर प्रभाव
कावेरी डेल्टा भारत के सबसे उपजाऊ कृषि क्षेत्रों में से एक माना जाता है।
यदि पर्याप्त पानी नहीं मिला तो—
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धान का उत्पादन घट सकता है।
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किसानों का उत्पादन खर्च बढ़ सकता है।
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भूजल पर निर्भरता बढ़ेगी।
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किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ेगा।
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खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर सिंचाई उपलब्ध कराना अत्यंत आवश्यक है।
राजनीतिक महत्व
कावेरी जल विवाद केवल कृषि का मुद्दा नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण राजनीतिक विषय भी है।
तमिलनाडु और कर्नाटक दोनों राज्यों में राजनीतिक दल किसानों के हितों की रक्षा का दावा करते हैं।
जल बंटवारे का मुद्दा अक्सर चुनावी राजनीति में भी प्रमुख स्थान रखता है।
इस बार भी किसानों के आंदोलन के बाद राजनीतिक दलों ने अपने-अपने पक्ष रखे हैं।
संभावित समाधान
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल न्यायालय के आदेशों से ही समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
इसके लिए कई दीर्घकालिक उपाय आवश्यक हैं—
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जलाशयों का बेहतर प्रबंधन।
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माइक्रो इरिगेशन तकनीकों का विस्तार।
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वर्षा जल संचयन को बढ़ावा।
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जल संरक्षण कार्यक्रम।
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वैज्ञानिक आधार पर जल वितरण।
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दोनों राज्यों के बीच बेहतर समन्वय।
यदि इन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए तो भविष्य में इस प्रकार के विवादों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
Madhavisanvi